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पूजा से पहले क्यों किया जाता है आचमन, जानें महत्व और सही तरीका

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हिंदू धर्म शास्त्रों में पूजा का विशेष महत्व है. किसी भी कार्य के लिए जब घर पर पूजा की जाती है, तो उसकी शुरुआत आचमन के साथ ही होती है. अगर आचमन न किया जाए, तो व्यक्ति को पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता. पूजा के दौरान आचमन की परंपरा सदियों पुरानी है. धार्मिक मान्यता है कि आचमन से भगवान प्रसन्न होते हैं. आचमन गंगाजल या शुद्ध जल से किया जाता है. हाल ही में एनजीटी ने कहा प्रयागराज में गंगा और यमुना का जल आचमन के लायक नहीं. बता दें कि क्षेत्रीय उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट पर एनजीटी ने की टिप्पणी,

आचमन का अर्थ

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पूजा से पहले पूजा में बैठे व्यक्ति को स्वंय को पवित्र करना आचमन कहलाता है. ऐसे में पूजा में बैठे व्यक्ति को हाथ में जल लेकर ग्रहण करना होता है. इससे व्यक्ति का मन और हृदय शुद्ध होते हैं.

आचमन का खास महत्व

हिंदू धर्म शास्त्रों में आचमन का खास महत्व बताया गया है. आचमन के दौरान जल दाएं हाथ के अंगूठे को भिगोते हुए मुंह को स्पर्श करते हैं. कहते हैं कि ऐसा करने से व्यक्ति को अथर्ववेद की तृप्ति होती है. इसके अलावा, आचमन के दौरान मस्तिष्क को स्पर्श करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं. वहीं दोनों आंखों को छूने से सूर्य तृप्त होते हैं. नासिका को स्पर्श करने से वायु को तृप्ति प्राप्ति होती है. कानों को स्पर्श करने से सभी ग्रंथियां तृप्त हो जाती है.

आचमन की सही विधि

पूजा स्थल पर पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को पहले एक जगह एकत्रित कर लें. इसके बाद तांबे के लोटे में पवित्र गंगाजल या पीने का पानी रखें. इस पानी में तुलसी की पांच पत्तियां और एक चम्मच डालें.

आचमन करने के लिए हाथ में जल को तीन बार लें. इसके बाद अपने इष्टदेव, देवता गणों और नवग्रहों का ध्यान करते हुए इसे ग्रहण करें. इसी जल को आचमन कहा जाता है. जल ग्रहण करने के बाद इस हाथ को माथे और कान से लगाएं. फिर जल हथेली पर लें और तीन बार मंत्र का उच्चारण करते हुए ग्रहण करें.