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पुराने समय में वार-नक्षत्र देखकर होती थी खेती, जानें धान की बुवाई-रोपाई का सही समय, बढ़‍िया होगी उपज

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भारतीय परंपरा में कोई भी काम करने से पहले शुभ मुहूर्त का खासा ध्‍यान रखा जाता है. दुनिया में विज्ञान और तकनीक का बहुत विकास हो चुका है, लेकिन भारत में आज भी लोग शादी, गृह प्रवेश, नामकरण जैसे काम शुभ मुहूर्त देखकर करते हैं. खेती-बाड़ी भी इस परंपरा से अछूती नहीं है. पुराने समय में किसान खेती-बाड़ी से जुड़ी गतिविधि‍यां- जैसे बुवाई, कटाई, सिंचाई वगैरह मुहूर्त देखकर करते थे. आज भले ही दुनिया समेत देशभर में आधुनिक तरीकों से खेती की जा रही हो, लेकिन परंपरागत ज्ञान को पूरी तरह नजरअंदाज करना समझदारी नहीं है.

इस मॉनसून धान की अच्‍छी फसल की उम्‍मीद

आज खेती की लागत (बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, मजदूरी आदि) काफी बढ़ गई है. केंद्र और राज्य सरकारें किसानों की आय बढ़ाने और लागत घटाने की कोशिश कर रही है. वहीं, इस बार मॉनसून सीजन में सामान्य से ज्‍यादा बारिश होने की संभावना बन रही है. ऐसे में खरीफ फसलों- धान, तुअर सोयाबीन समेत कई फसलों की बंपर पैदावार की उम्‍मीद है.

खासकर इस सीजन में धान को लेकर किसान ज्‍यादा खुश है, क्‍याेंकि इसमें ज्‍यादा पानी की जरूरत होती है. ऐसे में अगर किसान पुरानी परंपरा और नए ज्ञान के साथ समन्‍वय स्‍थापि‍त कर खेती करते हैं तो ज्‍यादा और क्‍वालिटी से भरपूर उत्‍पादन हासिल कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं धान की खेती से जुड़ी परंपरागत बातें जिन्‍हें अपनाकर पहले धान की खेती की जाती थी.

धान की बुवाई के लिए आर्द्रा

लोककवि घाघ ने अपने दोहों के माध्‍यम से खेती से जुड़ी गतिविधि‍यों को करने की जानकारी दी है. ये मौसम, नक्षत्र और वार (दिन) से प्रेरित हैं. घाघ अपने दोहे में कहते हैं- “आर्द्रा धान पुनर्वसु पैया, रोए किसान जो बोए चिरैया. चित्रा गेहूं आर्द्रा धान, न उनके गेरुई न इनके धाम.” दोहे में बताया गया है कि धान की बुवाई आर्द्रा नक्षत्र में करना सबसे सही होता है. इस समय वातावरण में नमी होती है और मौसम ठंडा होता है. इस समय फसल बोने पर इसमें काफी समय तक नमी बनी रहती है. इस साल यह नक्षत्र 8 से 21 जून तक रहेगा, जो मानसून की सक्रियता का भी समय होगा.

पुरवा में धान की रोपाई है घातक

“पुरवा में जनि रोपै भैया, एक धान में सोलह पैया.” इस दोहे में घाघ कहते हैं कि पुरवा नक्षत्र में धान की रोपाई करने से फसल कमजोर हो सकती है और पैदावार घट जाती है. वहीं खेती में दिनों का भी काफी महत्‍व है. वे आगे कहते हैं- “बुद्ध, बृहस्पति को भले, शुक्र न करे बखान. रवि, मंगल बोअनी करे, द्वार न आए धान.”

इसका मतलब है कि धान की बुवाई बुधवार या गुरुवार को करनी चाहिए. रविवार और मंगलवार को बुवाई करने से पैदावार इतनी कम होती है कि धान दरवाजे तक (घर) भी नहीं पहुंचती. इसके अलावा एक अन्य दोहे में वे कहते हैं: “बुध बोअनी, शुक लवनी.” इसका मतलब है- बुधवार को बुवाई और शुक्रवार को कटाई सबसे शुभ मानी जाती है.