नई दिल्ली : सनातन धर्म में पितृ पक्ष का खास महत्व है। इस दौरान पितृ पृथ्वी पर निवास करते हैं। इसके लिए पितरों का तर्पण और पिंडदान करते हैं। पितृ पक्ष के प्रथम दिवस से लेकर अमावस्या तिथि तक पितरों की पूजा की जाती है।
धार्मिक मत है कि पितरों का तर्पण और पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही व्यक्ति विशेष पर पितरों की कृपा बरसती है। उनकी कृपा से सुख, सौभाग्य और वंश में वृद्धि होती है। बिहार के गयाजी में पितृ पक्ष के दौरान बड़ी संख्या में साधक अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि पितृ पक्ष के दौरान क्यों सत्तू खाने की मनाही होती है? आइए, इसके बारे में जानते हैं-
- भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध 7 सितंबर को है।
- 8 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध है।
- 9 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध है।
- 10 सितंबर को तृतीया और चतुर्थी श्राद्ध है।
- 11 सितंबर को पंचमी श्राद्ध है।
- 12 सितंबर को षष्ठी श्राद्ध है।
- 13 सितंबर को सप्तमी श्राद्ध है।
- 14 सितंबर को अष्टमी श्राद्ध है।
- 15 सितंबर को नवमी श्राद्ध है।
- 16 सितंबर को दशमी श्राद्ध है।
- 17 सितंबर को एकादश श्राद्ध है।
- 18 सितंबर को द्वादशी श्राद्ध है।
- 19 सितंबर को त्रयोदशी श्राद्ध है।
- 20 सितंबर को चतुर्दशी श्राद्ध है।
- 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या है।
सत्तू खाने की क्यों है मनाही? (Pitru Paksha niyam)बिहार के गयाजी में फल्गु नदी के तट पर पितरों का तर्पण और पिंडदान किया जाता है। शास्त्रों में निहित है कि बिहार के गयाजी में पितरों का तर्पण और पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। असुर गयासुर के नाम पर पावन भूमि को गयाजी कहा जाता है।
गयाजी से 10 किलोमीटर की दूरी पर प्रेतशिला पर्वत है। इस पर्वत की शिखा पर असमय मरने वाले पितरों का श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। मान्यता है कि प्रेतशिला पर्वत पर पिंडदान करने से असमय मरने वाले पितरों को यथाशीघ मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। वहीं, असमय मरने वाले पितरों का पिंडदान सत्तू से किया जाता है। इसके लिए पितृपक्ष के दौरान सत्तू खाने की मनाही होती है।




