शिमला : ‘कभी सूखी रोटियों से पेट भरा, कभी आंसुओं से हौसला जुटाया- पर सपने नहीं टूटने दिए।’ यह कहानी है हिमाचल के छोटे से गांव पारसा की मां-बेटी की, जिन्होंने संघर्ष की आग में तपकर इतिहास रच दिया। जब भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्व कप अपने नाम किया तो इस जीत के पीछे शिमला की बेटी रेणुका सिंह ठाकुर और उनकी मां सुनीता ठाकुर का त्याग और जज्बा चमक उठा।
हिमाचल को यह गर्व दिलाया शिमला जिले के रोहड़ू उपमंडल के पारसा गांव निवासी स्टार गेंदबाज रेणुका सिंह ठाकुर ने। रेणुका की सफलता के पीछे उसकी मां सुनीता ठाकुर का सालों का संघर्ष छिपा है। बेटी की सफलता पर जब दैनिक जागरण ने मां सुनीता से बात की तो उनके खुशी के आंसू छलक आए।
पिता का बेटी को क्रिकेटर बनाने का सपना उसके मन में था, लेकिन इसके प्रशिक्षण का खर्च मेरी कमाई से काफी ज्यादा था। सिर्फ जूते का खर्च ही 15 हजार रुपये था, अन्य खर्चे अलग थे। इनको पूरा करने के लिए उधार लिया और बेटी के सपने को साकार करवाने में जुट गई।




