नई दिल्ली: भाजपा ने लंबी प्रतीक्षा के बाद जब कुर्मी बिरादरी से आने वाले केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया तो इसे अखिलेश यादव के पीडीए फार्मूले यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोट की काट के रूप में देखा जाने लगा। मगर, समाजवादी पार्टी फिलहाल सत्ता पक्ष के इस दांव से निश्चिंतता प्रदर्शित कर रही है।
पार्टी के शीर्ष नेता कई तथ्यों-तर्कों के आधार पर दावा करते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले कुर्मी वोटबैंक पर अब भी सपा की मजबूत पकड़ है। हां, बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन को मिली करारी हार से सबक लेते हुए अपनी रणनीति वह जरूर बनाएगी, चुनावी बिसात पर प्रत्याशी के रूप में मोहरे वह 2027 के विधानसभा चुनाव में भी 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह ही सजाएगी।
वह मानते हैं कि वहां राजद और कांग्रेस का तालमेल बहुत खराब था। वहां एसआईआर और वोट चोरी को मुद्दा बनाने का प्रयास तो किया गया, लेकिन बूथ पर अपनी तैयारी राजद-कांग्रेस और सहयोगी दल नहीं कर सके। इसके अलावा टिकट का बंटवारा बहुत ही खराब था। वहीं, यूपी में सपा के रणनीतिकारों ने एसआईआर के सिर्फ विरोध की बजाए तय किया है कि हम सक्रियता से बूथों पर एक-एक वोट की निगरानी करेंगे।
इनमें भी सभी दलों से यूपी से जीते कुल कुर्मी बिरादरी के 11 सांसदों में सपा के सात, भाजपा के तीन और अपना दल एस के एक सांसद रहे। सपा सांसद कहते हैं कि इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि विधानसभा क्षेत्रों इस वर्ग से भाजपा के अधिक जनप्रतिनिधि होने के बावजूद सपा की पकड़ इस वर्ग पर मजबूत रही।
अब भी सपा की रणनीति होगी कि महाराजगंज सांसद व भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी को उन्हीं के आसपास के क्षेत्र में प्रभावशली कुर्मी नेताओं से घेरा जाए। संभव है कि कुछ सांसदों को सपा विधानसभा चुनाव के मैदान में उतार दे। इसके अलावा पीडीए को मजबूत करने के लिए पार्टी जल्द ही जातीय समीकरणों के अनुसार प्रत्याशियों को शार्टलिस्ट करना शुरू कर देगी।




