रायपुर : राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि सभी अपने मन से अलगाव और भेदभाव हटाएं। जो भी हिंदू है वो एक है। सभी मंदिर, जलस्त्रोत और श्मशान गृह सभी के लिए खुले रहें। किसी का मूल्यांकन उसकी जाति, संपत्ति या भाषा से न करें।
सामाजिक समरसता हमारी मजबूती बने। हमें एक दूसरों के घर आना-जाना चाहिए। हमें संकटों पर चर्चा को विस्तार देने की बजाए उनके उपायों पर काम करना चाहिए। सक्षम होकर केवल विचारों को आगे बढ़ाने की जगह कुछ करते हुए राह बनानी चाहिए। भागवत ने अरावली पर्वतमाला का उदाहरण देते हुए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया।
वे रायपुर से 20 किलोमीटर दूर सोनपैरी गांव में बुधवार को आयोजित हिंदू सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश का मौजूदा विषय हो या परिवार की नई पीढ़ी से जुड़ी समस्या, सभी तरह के संकट केवल चर्चा से नहीं हल होंगे। उनके उपायों पर सामूहिक कार्य जरूरी है। भागवत ने कहा कि अभी केवल हिंदू धर्म में ही ऐसे संत हैं, जिन्होंने ईश्वर को प्रत्यक्ष रूप से देखा है। उनके बताए मार्ग पर चलने से पाप धुल जाते हैं।
लगभग आधे घंटे तक चले उद्बोधन में सरसंघचालक भागवत ने पांच ऐसे कार्य बताए जिनके सहारे परिवार, समाज, देश और विश्व के कल्याण का रास्ता खुल सकता है। सरसंघचालक ने कहा कि जब आदमी अकेला पड़ता है तो व्यसनों में पड़ता है। इसे दूर करने के लिए हमें सबसे पहले अपने परिवार से बातचीत बढ़ानी चाहिए। इसे संघ ने मंगल संवाद और कुटुंब प्रबोधन का नाम दिया है।
अपने परिवार के साथ सप्ताह में कम से कम एक शाम गुजारनी चाहिए। गपशप करें, भजन करें। ऐसे प्रेरक व्यक्तित्वों पर चर्चा करें जिन्होंने हिंदुत्व के आदर्शों के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। किसी भी विषय पर आदेश देने की बजाए सहमति बनाने का प्रयास करें।
स्वावलंबन से जगाए स्वबोधस्वावलंबन के लिए स्वबोध होना जरूरी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों की जगह देश की कंपनियों को प्राथमिकता दें। भाषा, भोजन, भवन और भोजन स्वबोध से प्रेरित हों।
संविधान, नियम कानून का पालनभागवत ने कहा कि नागरिकों के लिए तय नियम-कानून का पालन आवश्यक है। संविधान की प्रस्तावना, उसमें बताए गए नागरिक कर्तव्य और अधिकार व मार्गदर्शक सिद्धांतों का उसी भावना से पालन करें। यही धार्मिक आचरण है।
भागवत ने कहा कि अरावली पहाड़ियां केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन की रीढ़ हैं। यदि विकास के नाम पर ऐसे प्राकृतिक ढांचों को नष्ट किया गया तो उसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास जरूरी है, लेकिन वह प्रकृति को साथ लेकर ही टिकाऊ हो सकता है। युवाओं से संवाद करते हुए उन्होंने कहा कि रोजगार, करियर और आधुनिक सुविधाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। जीवनशैली और नीतियों, दोनों स्तर पर बदलाव की जरूरत है।
डॉ. भागवत ने युवाओं में बढ़ते अकेलेपन और नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि परिवारों में संवाद और भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होगा, तो युवा गलत रास्तों की ओर नहीं जाएंगे। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे छोटे-छोटे फैसलों से पर्यावरण संरक्षण और समाज निर्माण की बड़ी शुरुआत करें।




