नई दिल्ली : देश में विभिन्न रोगों के उपचार के लिए लोगों का मेडिकल स्टोर पर जाकर अपनी मर्जी से एंटीबायोटिक्स खरीदना आम है।
बिना जरूरत के एंटीबायोटिक्स या अन्य एंटीमाईक्रोबियल दवाएं खाने या इनकी उचित डोज न लेने के कारण अनेक बैक्टीरिया, वायरस, पैरासाईट और फंगस ने इन जीवनोपयोगी दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है।
ईस एंटी माईक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्तमान में मानवता के समक्ष 10 सर्वाधिक बड़े खतरों में से एक बताया है।
बिना डॉक्टरी सलाह एंटीबायोटिक्स से बढ़ा रहा AMR इसे देखते हुए दैनिक जागरण अपने सरोकार- स्वस्थ समाज के तहत ईंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के साथ मिलकर आज से एक समाचारीय अभियान की शुरुआत कर रहा है, जो आपको एएमआर के कारणों और उसके प्रभाव से परिचित कराते हुए बताएगा कि एंटीमाईक्रोबियल दवाओं के ईस्तेमाल को लेकर आपकी क्या जिम्मेदारी है।
साथ ही उन व्यवस्थागत कमजोरियों और नीतिगत चुनौतियों को भी सामने लाएगा, जो ईस संकट को और गहरा कर रही हैं। इस अभियान के जरिये हम बताएंगे कि मेडिकल स्टोर संचालक किस तरह मरीजों को बिना डाक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक्स देकर एएमआर को बढ़ावा दे रहे हैं।
समाचारीय अभियान के बाद हम आपके साथ ही केमिस्ट और डाक्टरों तक भी पहुंचेंगे और उन्हें बताएंगे कि एएमआर को बढ़ने से रोकने में किस तरह उनका योगदान जरूरी है।
आईसीएमआर की 2024-25 की निगरानी रिपोर्ट वर्तमान में विश्वभर में हर साल 50 लाख से अधिक मौतें एएमआर के कारण हो रही हैं। आईसीएमआर की 2024-25 की निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में औसतन करीब 30 प्रतिशत बैक्टीरियल संक्रमण पर अब सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं दिखा रही हैं।
एएमआर के कारण ईलाज की अवधि बढ़ रही है और खर्च भी अधिक हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी विगत 28 दिसंबर को ‘मन की बात’ में एएमआर को लेकर चिंता जताई और लोगों से अपील की कि एंटीबायोटिक्स दवाओं को सिर्फ डाक्टरी सलाह पर ही लें।




