भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में मृत्युदंड को लेकर एक चौंकाने वाला रुझान सामने आया है। नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के ‘स्क्वायर सर्कल क्लिनिक’ द्वारा जारी 10 वर्षों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि निचली अदालतों द्वारा दी जाने वाली फांसी की सजा में गलत या अनुचित दोषसिद्धि का एक तय पैटर्न बन गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में जहां ट्रायल कोर्ट ने 1,310 लोगों को मौत की सजा सुनाई, वहीं उच्च न्यायालयों ने इनमें से केवल 70 मामलों में ही सजा की पुष्टि की। यह संख्या कुल मामलों का बेहद छोटा हिस्सा है, जो न्याय प्रक्रिया में निचली स्तर पर गंभीर खामियों की ओर इशारा करती है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले तीन लगातार वर्षों (2023-2025) में एक भी फांसी की सजा की पुष्टि नहीं की है। इसके उलट, शीर्ष अदालत में बरी होने की दर में भारी उछाल आया है। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास आए 19 में से 10 मामलों में आरोपियों को पूरी तरह बरी कर दिया, जो 2016 के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी माना अधिकारों का उल्लंघनअगस्त 2025 में ‘वसंत संपत दुपारे बनाम भारत सरकार’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि मृत्युदंड की सुनवाई निष्पक्ष सुनवाई का एक अनिवार्य हिस्सा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और जेल रिकॉर्ड जैसी रिपोर्ट के बिना दी गई सजा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानी जाएगी।
उत्तर प्रदेश में मृत्युदंड पाए कैदियों की संख्या सबसे अधिक है। इसके बाद गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक का स्थान है। रिपोर्ट में एक और गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ” बिना छूट वाली आजीवन कारावास की सजा व्यक्ति से उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उम्मीद छीन लेती है और इस क्षेत्र में अभी स्पष्ट कानूनी ढांचे की कमी है।”




