नई दिल्ली: कुछ घाव कभी नहीं भरते, और कुछ कहानियां कभी मिटने का नाम नहीं लेतीं। 1947 का विभाजन, भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है, जिसे सिनेमा के माध्यम से बार-बार दिखाया गया है। हर फिल्म निर्माता ने उस युग के दुख, हिंसा और मानवीय लचीलेपन को अलग-अलग लेंस लगाकर अपने तरीके से उकेरने की कोशिश की है।
फिल्म की कहानी एक छोटी सी घटना से शुरू होती है जिसमें ठेकेदार (पंकज कपूर), नत्थू (ओम पुरी) को सूअर मारने के लिए कहता है। पहले तो वो इसके लिए मना करता लेकिन बाद में बड़ी जदोजहद के बाद मान जाता है। इस घटना के बाद पूरे शहर में दंगे भड़क जाते हैं जिसे कुछ नेता और धर्म प्रचारक इसे भुनाने की कोशिश करते हैं।
इस शो ने उस दौर में तीन पुरस्कार जीते थे। साल 1988 के नेशनल अवॉर्ड के तहत इसे नरगिस दत्त अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म ऑन नेशनल इंटीग्रेशन का अवॉर्ड मिला। शो की एक्ट्रेस सुरेखा सीकरी ने बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का खिताब जीता और वनराज भाटिया ने बेस्ट म्यूजिक डायरेक्शन के लिए अवॉर्ड हासिल किया।




