सनातन धर्म में ज्येष्ठ महीने का खास महत्व है। यह महीना जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस महीने में अति मंगलकारी निर्जला एकादशी मनाई जाती है। इस व्रत की महिमा सनातन शास्त्रों में निहित है। कहते हैं कि निर्जला एकादशी व्रत करने से साधक को सभी एकादशियों के समान फल मिलता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। आइए, निर्जला एकादशी के बारे में सबकुछ जानते हैं-
कब मनाई जाती है निर्जला एकादशी?
हर साल ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर निर्जला एकादशी मनाई जाती है। इस शुभ अवसर पर व्रत रख लक्ष्मी नारायण जी की पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त निर्जला एकादशी का पारण रखा जाता है। वहीं, द्वादशी तिथि पर पारण किया जाता है। इस व्रत में निर्जला उपवास रखा जाता है। व्रत के दौरान एकादशी तिथि के सूर्योदय से लेकर द्वादशी तिथि के सूर्योदय होने तक अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता है।
- प्रारंभ: 24 जून को शाम 06 बजकर 12 मिनट पर
- समापन: 25 जून को रात 08 बजकर 09 मिनट पर
निर्जला एकादशी पर दुर्लभ संयोगनिर्जला एकादशी के दिन शिव और सिद्ध योग का संयोग बन रहा है। इसके साथ ही रवि योग का भी निर्माण हो रहा है। इस शुभ अवसर पर स्वाति और विशाखा नक्षत्र का संयोग है। वहीं, अभिजित मुहूर्त और वणिज और बव करण के भी योग हैं।




