चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर कलश स्थापना का विशेष महत्व है, लेकिन अक्सर विद्वान प्रदोषकाल (सूर्यास्त के बाद का समय) में कलश स्थापना करने से मना करते हैं।
शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है और इसकी शुरुआत ‘उदय तिथि’ और सूर्य की उपस्थिति में करना सबसे शुभ माना जाता है। कलश को ब्रह्मांड और देवताओं का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसकी स्थापना के लिए दिन का प्रकाश और शुभ मुहूर्त का होना अनिवार्य है। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों शाम के समय कलश स्थापना करना वर्जित माना गया है।
शास्त्रों में दिन के मुहूर्त का महत्व
हिंदू धर्म और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, कोई भी मंगल कार्य या नई शुरुआत ‘अभिजीत मुहूर्त’ या सुबह के समय करना श्रेष्ठ होता है। प्रदोषकाल को मुख्य रूप से भगवान शिव की आराधना और दीपदान के लिए जाना जाता है, लेकिन कलश स्थापना जैसे ‘आवाहन’ के कार्यों के लिए इसे उपयुक्त नहीं माना गया।
शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि प्रतिपदा तिथि सूर्यास्त के बाद भी रहती है, तब भी कलश स्थापना अगले दिन के सूर्योदय के बाद ही की जानी चाहिए। यह नियम आपके जीवन में ऊर्जा के सही संचालन और सकारात्मकता बनाए रखने के लिए बनाया गया है।
क्यों वर्जित है शाम का समय?
प्रदोषकाल का समय दिन और रात का संधि काल होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय तामसिक शक्तियां अधिक सक्रिय होती हैं, जबकि कलश स्थापना पूरी तरह से सात्विक और दैवीय कार्य है। शाम के समय स्थापना करने से पूजा का पूर्ण फल मिलने में आशंका रहती है।
इसके अलावा, कलश स्थापना का उद्देश्य घर में सुख-समृद्धि की बड़ी इच्छाएं पूरी करना होता है, जिसके लिए सूर्य की सकारात्मक किरणों का होना शुभ माना जाता है। पूजा के समय मन की सहजता और एकाग्रता सुबह के शांत वातावरण में जितनी बेहतर होती है, उतनी शाम के शोर-शराबे में नहीं हो पाती।
भगवान का धन्यवाद करें कि उन्होंने आपको इस पूजा का अवसर दिया। सही मुहूर्त में किया गया कार्य आपके जीवन के रखरखाव को बेहतर बनाता है और मां दुर्गा की कृपा आप पर हमेशा बनी रहती है।




