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क्या आप जानते हैं प्रसाद चढ़ाने का सही तरीका? यहां पढ़ें बनाने से लेकर ग्रहण करने तक के नियम

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किसी भी देवी देवता की पूजा भोग लगाए बिना पूरी नहीं होती। भोग लगाने के बाद उस भोग को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है, जो ईश्वर का आशीर्वाद समझा जाता है। ऐसे में इसे बनाने से लेकर ग्रहण करने तक के कुछ नियम बताए गए हैं, जिनका ध्यान रखने पर आपको पूजा का पूर्ण फल मिलता है। चलिए जानते हैं इन नियमों के बारे में।

प्रसाद बनाते समय न करें ये गलती

  1. प्रसाद हमेशा सात्विक यानी बिना प्याज-लहसुन के बना होना चाहिए।
  2. हमेशा स्नान के बाद ही प्रसाद तैयार करें।
  3. अशुद्ध हाथों से प्रसाद को छुने से बचें।
  4. प्रसाद बनाते समय इसे चखने की गलती बिल्कुल भी न करें, इससे वह जूठा हो जाता है।
  5. प्रसाद को हमेशा साफ या फिर नए बर्तनों में शुद्ध घी का उपयोग करके बनाना चाहिए।
  6. हो सके तो इसके लिए तांबे या पीतल के बर्तनों का उपयोग करें।
  7. प्रसाद बनाते समय मन में पूरी श्रद्धा रखें और नकारात्मक विचार न लाएं।

भोग लगाने के नियम

  1. भगवान को भोग को लगाने के बाद उसे तुरंत न हटाएं। पूजा में आप भोग को 5 मिनट के लिए रख सकते हैं।
  2. नैवेद्य या भोग को अपनी श्रद्धा के अनुसार पीतल, चांदी, या मिट्टी के बर्तनों में चढ़ा सकते हैं।
  3. भोग को कभी भी एल्यूमिनियम, लोहे, स्टील या प्लास्टिक के बर्तन में अर्पित न करें।
  4. आप देवी-देवताओं को उनके प्रिय भोग भी अर्पित कर सकते हैं, जिससे जल्दी मनोकामना पूरी होती है।

प्रसाद ग्रहण करने के नियम

  • भोग लगने के बाद प्रसाद को जितने लोगों में संभव हो उतने लोगों में बांटना चाहिए और खुद भी ग्रहण करना चाहिए।
  • पूजा के बाद प्रसाद को तुरंत वितरित और ग्रहण कर लेना चाहिए, वरना उसका प्रभाव कम हो जाता है।
  • प्रसाद को हमेशा दाहिने हाथ से ही लेना चाहिए।
  • प्रसाद को कभी भी जमीन पर या झूठे स्थान पर न रखें।
  • भंडारे का प्रसाद जरूरतमंदों के लिए होता है, इसलिए कोशिश करें कि यह लोगों तक ज्यादा पहुंचे, जिन्हें इनकी जरुरत है।

इन बातों का जरूर रखें ध्यानप्रसाद को कभी भी इधर-उधर गिराने की गलती न करें। प्रसाद का एक भी दाना अगर जमीन या कूड़ेदान में गिरता है, तो यह अपमान माना जाता है। प्रसाद को ज्यादा देर रखने से इसका प्रभाव समाप्त हो जाता है, ऐसे में इसे घर ले जाकर रखने के बजाय तुरंत बांटना या खाना बेहतर होता है। प्रसाद लेते समय सीधे खड़े होकर या बैठकर सम्मानपूर्वक लेना चाहिए और प्रणाम करना चाहिए, इसके बाद ही प्रसाद ग्रहण करें।