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केवल परंपरा नहीं, सौभाग्य का प्रतीक है बिछिया, जानें इसके पीछे का धार्मिक रहस्य

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भारतीय संस्कृति में विवाहित महिलाओं के लिए सोलह शृंगार का विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक आभूषण है बिछिया। पैर की उंगलियों में पहनी जाने वाली यह छोटी सी अंगूठी केवल एक सजावट की वस्तु नहीं है,

बल्कि इसके पीछे धार्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक वजह है, तो आइए एस्ट्रोलॉजर चंद्रेश शर्मा जी से जानते हैं कि विवाहित महिलाएं बिछिया क्यों पहनती हैं और इसका महत्व क्या है?

धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व
हिंदू धर्म में बिछिया को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। रामायण काल में भी बिछिया का उल्लेख मिलता है, जब माता सीता ने रावण द्वारा हरण किए जाने पर अपनी पहचान के रूप में बिछिया फेंक दी थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पैरों में बिछिया पहनने से सूर्य और चंद्रमा की कृपा बनी रहती है।

बिछिया हमेशा चांदी की ही पहनी जाती है। शास्त्रों के अनुसार, पैरों में कभी भी सोने के आभूषण नहीं पहनने चाहिए। पैरों में सोना पहनना धन की देवी लक्ष्मी जी का अपमान माना जाता है, इसलिए हमेशा चांदी की बिछिया ही धारण करनी चाहिए।

बिछिया पहनने के जरूरी नियम

  1. अपनी पहनी हुई बिछिया कभी भी किसी दूसरी महिला को न दें। माना जाता है कि इससे पति के भाग्य और आर्थिक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है।
  2. आजकल फैशन में घुंघरू वाली बिछिया का चलन है, लेकिन पारंपरिक रूप से सादी बिछिया शुभ मानी जाती है ताकि उसकी आवाज मर्यादा के विपरीत न हो।
  3. अगर बिछिया टूट जाए, तो तुरंत नई बिछिया पहनें। सुहागिन महिला को पैर की उंगली खाली नहीं रखनी चाहिए।

वैज्ञानिक वजहज्योतिषाचार्य चंद्रेश शर्मा ने बताया कि बिछिया केवल एक शृंगार नहीं, बल्कि एक विवाहित स्त्री की पहचान और मान-सम्मान का प्रतीक है। इसे पहनने के पीछे बहुत ही गहरा अर्थ छिपा है। पैरों की उंगलियों में बिछिया पहनने से शरीर के कुछ खास बिंदुओं पर दबाव बनता है, जो महिलाओं के व्यवहार में शालीनता और धीरज लाने में मदद करता है। बिछिया के लिए चांदी की धातु को सबसे उत्तम माना गया है। चांदी की तासीर ठंडी होती है, जो शरीर को शांति और शीतलता प्रदान करती है।