नई दिल्ली : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच बीजिंग में आयोजित शिखर सम्मेलन वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ एलन मस्क, टिम कुक और जेन्सेन हुआंग जैसे अमेरिका की सबसे शक्तिशाली कंपनियों के 15 CEO के प्रतिनिधिमंडल भी पहुंचे।
चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अमेरिकी व्यापारिक जगत को आश्वस्त करते हुए कहा है कि चीन के दरवाजे अमेरिकी व्यवसायों के लिए और अधिक खुलेंगे और वहां उनके लिए व्यापक संभावनाएं होंगी। बीजिंग में आयोजित यह शिखर सम्मेलन पिछले एक साल से जारी भीषण टैरिफ युद्ध को शांत करने, आपूर्ति श्रृंखलाओं को बहाल करने और ईरान संकट व ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बनाने का एक बेहतरीन प्रयास है।
अमेरिका में मुद्रास्फीति बढ़ीदरअसल, दोनों देश (अमेरिका और चीन) की अर्थव्यवस्थाएं पिछले साल के टैरिफ युद्ध के झटके महसूस कर रही हैं। टैरिफ 100 प्रतिशत से अधिक हो गए। आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित हुईं। अमेरिका में मुद्रास्फीति बढ़ी। चीन में निर्यात धीमा हो गया। अब एक ओर जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप बाजार की मजबूती के लिए एक बड़े समझौते की तलाश में हैं तो वहीं दूसरी ओर चीनी राष्ट्रपति चिनफिंग अपनी सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिकी व्यापार जगत के नेताओं के साथ एक बैठक के दौरान शी चिनफिंग ने कहा कि चीन के द्वार अमेरिकी व्यवसायों के लिए और भी अधिक खुलेंगे। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिकी कंपनियों के लिए देश में व्यापक संभावनाएं होंगी।
- ट्रंप का सार्वजनिक नारा सीधा-सादा है: “चीन के दरवाजे खोलो।” इस नारे के पीछे तीन ठोस मांगें हैं-
- अमेरिकी कंपनियों के लिए बाजार तक आसान पहुंच
- चीन द्वारा अमेरिकी वस्तुओं की बढ़ती खरीद – सोयाबीन, एलएनजी, विमान
- राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाए बिना लगभग 30 अरब डॉलर मूल्य के सामानों पर शुल्क कम करने का एक ढांचा।
अमेरिकी राष्ट्रपति यह भी चाहते हैं कि चीन आपूर्ति श्रृंखलाओं का शस्त्रीकरण बंद करे – विशेष रूप से दुर्लभ पृथ्वी और महत्वपूर्ण खनिजों का, जो अमेरिकी प्रौद्योगिकी और रक्षा उद्योगों को शक्ति प्रदान करते हैं। हालांकि, उनकी पिछली बैठक के बाद से, चीन ने यह दिखाया है कि वह दुर्लभ-पृथ्वी खनिजों के निर्यात को सख्त करके अमेरिका के कमजोर क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा सकता है।
यदि ट्रंप ताइवान पर अपना रुख नरम करते हैं, तो चीन पर अमेरिकी रणनीतिक दबाव कम हो जाएगा, जो भारत के लिए अनुकूल नहीं है, क्योंकि यदि चीनी निर्यात को फिर से शुल्क में छूट मिलती है, तो इस्पात, सौर ऊर्जा, रसायन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे भारतीय क्षेत्रों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। इसलिए बीजिंग में हो रहे अमेरिका-चीन शिखर-सम्मेलन पर बारीकी से नजर रख रहा है।



