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CGPSC के पूर्व अध्यक्ष आरएस विश्वकर्मा को हाईकोर्ट से झटका, अतिरिक्त पेंशन की मांग खारिज

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बिलासपुर : छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने CGPSC छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष व छत्तीागढ़ के पूर्व चीफ सिकरेट्री आरएस विश्वकर्मा द्वारा संशोधित सेवा नियमों के तहत अतिरिक्त पेंशन लाभों की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, पेंशन संबंधी अधिकार सेवानिवृत्ति की तिथि पर लागू नियमों द्वारा शासित होते हैं। कोर्ट सरकार को वित्तीय निहितार्थों से जुड़े नीतिगत निर्णयों को पूर्वव्यापी रूप से बदलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

पेंशन कानून और सेवा विनियमों की पूर्व व्यापी प्रयोज्यता पर एक महत्वपूर्ण फैसले में, जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने सेवानिवृत्त पीएससी चेयरमैन आरएस विश्वकर्मा को बढ़ी हुई पेंशन लाभ देने से इनकार करने के राज्य सरकार के निर्णय में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। कोर्ट ने माना है, संशोधित छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सेवा शर्तें) विनियम, 2001, जो 1 अप्रैल, 2018 से लागू हुए थे, उस व्यक्ति पर लागू नहीं किए जा सकते जो उस तिथि से पहले सेवानिवृत्त हो चुके थे।

यह मामला संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत दायर एक रिट याचिका से उत्पन्न हुआ है, जिसमें 13 अगस्त, 2021 के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके द्वारा राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता विश्वकर्मा की पेंशन वृद्धि के संबंध में पेश अभ्यावेदन को खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ता ने 2020 की उस अधिसूचना की प्रभावी तिथि को पूर्वव्यापी रूप से संशोधित करने का निर्देश देने की भी मांग की थी, जिसमें पेंशन में वृद्धि की गई थी।

चीफ सिकरेट्री के बाद सीजीपीएससी का मेंबर और बाद में बने चेयरमैन

आरएस विश्वकर्मा 31 जनवरी, 2015 को छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव के पद से 11.59 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन के साथ सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद, उन्होंने मार्च 2015 में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग में सदस्य के रूप में कार्यभार संभाला और बाद में जून 2015 में अध्यक्ष नियुक्त हुए। 16 जनवरी, 2017 को राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए।

पढ़िए क्या है विवाद का कारण?

यह विवाद छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सेवा शर्तें) विनियम, 2001 के विनियम 8(3) से संबंधित था, जिसे संविधान के अनुच्छेद 318 के अंतर्गत बनाया गया था। आरएस विश्वकर्मा की सेवानिवृत्ति के समय, इस विनियम के अनुसार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के लिए अधिकतम संयुक्त वार्षिक पेंशन 4.80 लाख रुपये निर्धारित थी। चूंकि याचिकाकर्ता अपनी पिछली सरकारी सेवा से पहले ही इस सीमा से अधिक पेंशन प्राप्त कर रहे थे, इसलिए उन्हें लोक सेवा आयोग में अपने कार्यकाल के लिए कोई अतिरिक्त पेंशन नहीं दी गई। सातवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद, राज्य सरकार ने 5 दिसंबर, 2020 की अधिसूचना के माध्यम से नियमों में संशोधन किया। इस संशोधन ने पीएससी अध्यक्षों के लिए पेंशन की अधिकतम सीमा को बढ़ाकर 13.50 लाख रुपये वार्षिक कर दिया और वार्षिक पेंशन पात्रता में वृद्धि की। हालांकि, संशोधित नियम को स्पष्ट रूप से 1 अप्रैल, 2018 से प्रभावी बनाया गया था।

कोर्ट ने कहा: पेंशन अधिकार रिटायरमेंट तिथि पर हो जाते हैं निर्धारित

याचिकाकर्ता आरएस विश्वकर्मा ने तर्क दिया, चूंकि वेतन संशोधन 1 जनवरी, 2016 से लागू किया गया था, इसलिए संशोधित पेंशन विनियम को भी उसी तिथि से पूर्वव्यापी प्रभाव दिया जाना चाहिए था। उन्होंने अपने मामले की तुलना पीएससी के एक अन्य सदस्य एमएस. पैकरा के मामले से करते हुए भेदभाव का दावा किया। मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा, पेंशन अधिकार सेवानिवृत्ति की तिथि पर ही निर्धारित हो जाते हैं और उस समय प्रचलित नियमों के अनुसार ही तय किए जाते हैं। कोर्ट ने पाया, याचिकाकर्ता आरएस विश्वकर्मा 16 जनवरी, 2017 को सेवानिवृत्त हुए थे, जो संशोधित नियम के लागू होने से एक वर्ष से अधिक पहले का समय था। इसलिए, वे संशोधित पेंशन संरचना के तहत लाभ का दावा नहीं कर सकते।

पेंशन निर्धारण को लेकर हाई कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा है?

किसी परिपत्र को किसी विशेष तिथि से लागू करने का पूर्ण अधिकार नियम बनाने वाले प्राधिकरण के पास है, विशेष रूप से जब इसमें वित्तीय निहितार्थ शामिल हों। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच ने कहा, सेवानिवृत्ति और पेंशन लाभों की पुनर्गणना बाद के वेतन संशोधन के आधार पर नहीं की जा सकती है, जब तक कि संशोधित योजना स्पष्ट रूप से सेवानिवृत्त कर्मचारियों पर लागू न हो।

एमएस पैकरा के मामले में समानता के मुद्दे पर न्यायालय ने माना कि दोनों मामले मौलिक रूप से भिन्न थे। पैकरा की कुल पेंशन पुराने नियमों के तहत निर्धारित सीमा के भीतर थी, जबकि विश्वकर्मा की पूर्व सरकारी सेवा से प्राप्त पेंशन ही वैधानिक सीमा से अधिक थी। अतः संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत भेदभाव की दलील खारिज कर दी गई।

कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है, राज्य को संशोधन की प्रभावी तिथि को बदलने या याचिकाकर्ता को बढ़ी हुई पेंशन लाभ प्रदान करने का निर्देश देने वाला कोई परमादेश रिट जारी नहीं किया जा सकता है।