बेमेतरा : कलेक्टर प्रतिष्ठा ममगाई द्वारा जिले में आगामी संभावित अल्प वर्षा भू-जल स्तर को देखते हुए जिला प्रशासन ने किसानों से खरीफ मौसम में जल संरक्षण आधारित खेती एवं फसल विविधीकरण को अपनाने की अपील की है। बेमेतरा जिला वृष्टि छाया (रेन शैडो) क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जहां वर्षा की अनिश्चितता लंबे समय से कृषि के लिए चुनौती बनी हुई है। विगत वर्ष जिले में मात्र 535 मिमी औसत वर्षा दर्ज की गई थी, जो सामान्य वर्षा से काफी कम रही। मौसम विभाग एवं विभिन्न पूर्वानुमानों के अनुसार इस वर्ष भी सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। ऐसे में कृषि उत्पादन एवं किसानों की आय को सुरक्षित रखने के लिए समय रहते आवश्यक तैयारी करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कलेक्टर ने जिले के कृषकों से अपील करते हुए कहा है कि वे पारंपरिक रूप से अधिक पानी की आवश्यकता वाली लंबी अवधि की धान किस्मों के स्थान पर कम अवधि एवं कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली धान की किस्मों का चयन करें। विशेष रूप से एमटीयू-1010 (MTU-1010) एवं विक्रम टीसीआर (Vikram TCR) जैसी किस्में वर्तमान परिस्थितियों में अधिक उपयुक्त साबित हो सकती हैं। इसके साथ ही किसानों को उपलब्ध जल संसाधनों को ध्यान में रखते हुए दलहन एवं तिलहन फसलों का रकबा बढ़ाने तथा फसल विविधीकरण को अपनाने की सलाह दी गई है।
कलेक्टर ने बताया कि राज्य शासन द्वारा संचालित कृषक उन्नति योजना किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। योजना के अंतर्गत दलहन एवं तिलहन फसलों की खेती करने वाले किसानों को 10 हजार रुपये प्रति एकड़ तथा धान के स्थान पर दलहन, तिलहन एवं अन्य वैकल्पिक फसलें लेने वाले किसानों को 15 हजार रुपये प्रति एकड़ तक की प्रोत्साहन राशि प्रदान किए जाने का प्रावधान है। इससे न केवल किसानों की उत्पादन लागत कम होगी, बल्कि उनकी आय में भी वृद्धि होगी।
उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु परिस्थितियों और अनियमित वर्षा के दौर में केवल परंपरागत खेती पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए किसानों को कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार उन्नत एवं जल-संरक्षण आधारित तकनीकों को अपनाना चाहिए। कतार बोनी (लाइन सोइंग), मल्चिंग, जैविक पदार्थों के उपयोग तथा संतुलित उर्वरक प्रबंधन जैसी तकनीकों से मिट्टी में नमी लंबे समय तक संरक्षित रखी जा सकती है।
कलेक्टर ने सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर देते हुए कहा कि किसान ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति का अधिकतम उपयोग करें। इन तकनीकों से पानी की बचत के साथ-साथ फसलों को आवश्यक मात्रा में सिंचाई उपलब्ध कराई जा सकती है। धान की खेती में एसआरआई (System of Rice Intensification) पद्धति अपनाकर कम पानी में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है, जिससे जल उपयोग दक्षता में उल्लेखनीय सुधार होता है।
जल संरक्षण को जन आंदोलन का स्वरूप देने की आवश्यकता बताते हुए कलेक्टर ने किसानों से अपने खेतों एवं गांवों में वर्षा जल संचयन के उपाय अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि नलकूपों एवं बोरवेलों का रिचार्ज, सोक पिट निर्माण, खेत तालाब, मेड़बंदी, गली प्लग, स्टॉप डैम तथा अन्य जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण भविष्य में जल संकट से बचाव का प्रभावी माध्यम है। यदि वर्षा की प्रत्येक बूंद को सहेजने का प्रयास किया जाए तो कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध कराया जा सकता है।
कलेक्टर ने कहा कि जल ही कृषि की आधारशिला है और जल संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है। वर्तमान परिस्थितियों में फसल विविधीकरण, सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का उपयोग, जल संरक्षण आधारित कृषि पद्धतियां तथा वैज्ञानिक खेती ही किसानों की आय और कृषि उत्पादन को सुरक्षित रखने के प्रभावी उपाय हैं। उन्होंने जिले के सभी कृषकों से इन उपायों को अपनाने और बेमेतरा को जल-संरक्षित, कृषि समृद्ध एवं आत्मनिर्भर जिला बनाने में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।



