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हर महीने अलग नामों से पूजे जाते हैं भगवान गणेश, क्यों बदल जाता है संकष्टी चतुर्थी का नाम? जानिए इसके पीछे वजह

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हर माह की संकष्टी चतुर्थी का व्रत गणपति की आराधना के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि यह व्रत व्यक्ति को बड़े से बड़े संकटों से छुटकारा दिला सकता है। साथ ही यह व्रत करने से आध्यात्मिक रूप से भी लाभ मिलता है। खास बात यह है कि यह व्रत हर माह अलग नाम से जाना जाता है। क्या आपके मन में कभी यह सवाल नहीं कि आखिर क्यों हर महीने आने वाली संकष्टी चतुर्थी का नाम बदल जाता है। तो चलिए जानते हैं इसके पीछे क्या वजह है।

क्या है संकष्टी चतुर्थी व्रत?

संकष्टी चतुर्थी गणेश जी को समर्पित मासिक व्रत है, जो हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा और व्रत करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं। साथ ही सुख-समृद्धि और बुद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

क्या होता है संकष्टी का अर्थ?

‘संकष्टी’ संस्कृत शब्द है, जिसमें ‘संकट’ का अर्थ कठिनाई और ‘चतुर्थी’ का अर्थ चंद्र मास का चौथा दिन होता है। इस तिथि को ऐसे पावन अवसर के रूप में देखा जाता है, जब भगवान गणेश की पूजा से जीवन के संकट दूर होने की मान्यता है।

हर माह क्यों बदलता है संकष्टी चतुर्थी का नाम?

संकष्टी चतुर्थी हर महीने एक ही तिथि पर आती है, लेकिन इसका नाम हर बार अलग होता है। इसकी वजह भगवान गणेश के विभिन्न स्वरूप हैं। धर्म ग्रंथों में गणपति के कई दिव्य रूपों का वर्णन मिलता है।

धर्म ग्रंथों में मिलता है उल्लेख

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भविष्य पुराण और नरसिंह पुराण जैसे ग्रंथों में साल भर आने वाली सभी संकष्टी चतुर्थी के महत्व का वर्णन है। अधिक मास सहित कुल 13 संकष्टी चतुर्थी होती हैं, प्रत्येक का संबंध बप्पा के अलग-अलग रूप से हैं। संकष्टी चतुर्थी के बदलते नाम केवल परंपरा का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि भगवान गणेश के अलग-अलग स्वरूपों और उनके विशेष गुणों का स्मरण भी कराते हैं।

माह (Month) संकष्टी चतुर्थी के नाम (Vrat)
चैत्र विकट संकष्टी चतुर्थी
वैशाख एकदंत संकष्टी चतुर्थी
ज्येष्ठ कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी
आषाढ़ गजानन संकष्टी चतुर्थी
श्रावण हेरम्बा संकष्टी चतुर्थी
भाद्रपद विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी
आश्विन वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी
कार्तिक गणाधीपा संकष्टी चतुर्थी
मार्गशीर्ष अखुरथ संकष्टी चतुर्थी
पौष लंबोदर संकष्टी चतुर्थी
माघ द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
फाल्गुन बालचंद्र संकष्टी चतुर्थी
अधिक मास विभुवन संकष्टी चतुर्थी