मंदिर में दर्शन और पूजा के दौरान परिक्रमा करना सनातन धर्म की महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है। परिक्रमा का भी विशेष महत्व बताया गया है, जिसे भगवान के प्रति श्रद्धा, समर्पण और आस्था का प्रतीक माना जाता है। कई लोगों को इसकी सही जानकारी नही होती कि मंदिर में परिक्रमा किस दिशा से शुरू करनी चाहिए और किस देवी-देवता की कितनी परिक्रमा करना चाहिए। तो आइए जानते हैं परिक्रमा से जुड़े क्या नियम बताए गए हैं।
क्यों है परिक्रमा का महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिक्रमा का अर्थ है भगवान को केंद्र में रखकर श्रद्धा और भक्ति के साथ उनके चारों ओर घूमना। इसे ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। स्कंद पुराण में भी परिक्रमा के महत्व का उल्लेख मिलता है। श्रद्धापूर्वक की गई परिक्रमा से पूजा का फल और अधिक शुभ मिलने की मान्यता है।
किस देवता की कितनी परिक्रमा करें?
शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं की परिक्रमा की संख्या भी अलग मानी गई है।
- भगवान गणेश की सामान्यतः 3 या 5 परिक्रमा करना शुभ माना जाता है।
- भगवान विष्णु की 4 परिक्रमा करने की परंपरा है।
- मां दुर्गा की 1 या 9 परिक्रमा की जाती है।
- सूर्यदेव की 7 परिक्रमा करना शुभ माना गया है।
- शिवलिंग की कभी भी पूर्ण परिक्रमा नहीं की जाती। जलहरी (सोमसूत्र) को पार किए बिना अर्ध या निर्धारित परिक्रमा करने का नियम बताया गया है। अलग-अलग मंदिरों की परंपराओं के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर हो सकता है।
किस दिशा से शुरू करें परिक्रमा?
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर में परिक्रमा हमेशा दक्षिणावर्त, यानी घड़ी की दिशा में करनी चाहिए। यही परिक्रमा करने का सबसे सही और शुभफलदायी तरीका माना जाता है।
परिक्रमा करते समय ध्यान रखें ये बातें
- परिक्रमा हमेशा शांत मन और श्रद्धा से करें। भगवान का ध्यान करते हुए नाम जप करना शुभ होता है।
- परिक्रमा के दौरान जल्दबाजी या दौड़ने से बचें। सामान्य गति से ही भगवान की परिक्रमा करें।
- परिक्रमा करते समय मोबाइल चलाने, बातचीत करने या हंसी-मजाक न करें।
- इस बात का ध्यान रखें कि परिक्रमा करते समय किसी अन्य श्रद्धालु को परेशानी न हो।
- मंदिर की परंपराओं और नियमों का पालन करते हुए ही परिक्रमा करें।



