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Hartalika Teej 2026: क्यों रखा जाता है हरतालिका तीज का व्रत? जानें पूजा मुहूर्त और पूरी पौराणिक कथा

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Hartalika Teej 2026 Vrat Katha: हरतालिका तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धापूर्वक रखने से पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना पूरी होती है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत माता पार्वती की कठिन तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा से जुड़ा है।

हरतालिका तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की मिट्टी से बनी प्रतिमाओं या शिवलिंग की पूजा करने की परंपरा है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर शिव-पार्वती की आराधना करती हैं। पूजा के लिए सुबह और प्रदोष काल दोनों को शुभ माना गया है।

हरतालिका तीज 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष हरतालिका तीज पर पूजा के लिए सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक का समय शुभ बताया गया है। वहीं प्रदोष काल में पूजा का मुहूर्त शाम 5:54 बजे से रात 8:22 बजे तक रहेगा।

मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से शिव-पार्वती का पूजन करने के साथ हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनने या पढ़ने से व्रत का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।

हरतालिका तीज की व्रत कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म की स्मृतियां याद दिलाने के लिए हरतालिका तीज व्रत की कथा सुनाई थी।

कथा के अनुसार, पर्वतराज हिमालय के घर एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम उमा रखा गया। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण वह आगे चलकर पार्वती के नाम से प्रसिद्ध हुईं। बचपन से ही माता पार्वती ने भगवान शिव को अपना पति मान लिया था। उन्हें पति रूप में पाने के लिए उन्होंने कठिन तपस्या और शिव आराधना शुरू कर दी।

माता पार्वती की कठोर तपस्या देखकर उनके पिता पर्वतराज हिमालय चिंतित रहने लगे। उन्हें अपनी पुत्री के विवाह की भी चिंता थी। इसी दौरान एक दिन देवर्षि नारद पर्वतराज के यहां पहुंचे। पर्वतराज ने अपनी पुत्री के विवाह को लेकर चिंता व्यक्त की।

नारद जी ने उन्हें भगवान विष्णु को पार्वती के लिए योग्य वर बताया। पर्वतराज को यह प्रस्ताव पसंद आया और उन्होंने इसे अपनी पुत्री के लिए स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने पार्वती को भगवान विष्णु से विवाह की बात बताई।

यह सुनकर माता पार्वती बेहद दुखी हो गईं, क्योंकि उन्होंने मन ही मन भगवान शिव को अपना जीवनसाथी स्वीकार कर लिया था। उन्होंने अपनी सहेली को अपनी परेशानी बताई। उनकी सखी उन्हें एक घने जंगल में स्थित गुफा में ले गईं, ताकि वे अपनी तपस्या जारी रख सकें।

गुफा में पहुंचकर माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग बनाया और भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। उन्होंने भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को निर्जला व्रत रखा और पूरी निष्ठा से तपस्या की।

माता पार्वती की तपस्या और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छा स्वीकार करते हुए उन्हें पत्नी के रूप में वरण करने का वचन दिया। इसके बाद माता पार्वती ने अपना व्रत पूरा किया।

दूसरी ओर, पर्वतराज अपनी पुत्री को खोजते हुए उस स्थान तक पहुंच गए। माता पार्वती ने उन्हें बताया कि वह भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती हैं और इसी उद्देश्य से उन्होंने घर छोड़ा था। उन्होंने यह भी बताया कि भगवान शिव ने उनका वरण कर लिया है।

इसके बाद पर्वतराज ने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी और अपनी पुत्री की इच्छा को स्वीकार कर लिया। बाद में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ।

क्यों पड़ा ‘हरतालिका’ नाम?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती की सखी उन्हें अपने साथ घने वन में ले गई थीं। पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री को वहां न पाकर चिंतित हो गए थे। इसी प्रसंग से ‘हरतालिका’ नाम जुड़ा माना जाता है।

‘हरतालिका’ शब्द को ‘हरत’ और ‘आलिका’ से बना माना जाता है। इसमें ‘हरत’ का अर्थ हरण या ले जाना और ‘आलिका’ का अर्थ सखी या महिला मित्र बताया जाता है।

इसी वजह से हरतालिका तीज को माता पार्वती की तपस्या, दृढ़ संकल्प और भगवान शिव के प्रति उनकी अटूट भक्ति का प्रतीक माना जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन शिव-पार्वती की पूजा कर सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।