Home अन्य यूरिया और पानी की ये गलती… कर देगी धान की फसल को...

यूरिया और पानी की ये गलती… कर देगी धान की फसल को बर्बाद! कृषि एक्सपर्ट ने किया सावधान

13
0
धान की खेती में बाली निकलने का समय सबसे नाजुक और महत्वपूर्ण चरण माना जाता है. बुवाई के लगभग 60-65 दिन बाद जब फसल में बालियाँ निकलना शुरू होती हैं, तो यह पौधों की वृद्धि और उत्पादन का निर्णायक दौर होता है. इसी समय कीटों का प्रकोप भी तेजी से बढ़ जाता है. खासकर तना छेदक, माहू, गंधी बग, थ्रिप्स और लीफ फोल्डर जैसे कीट फसल पर हमला कर सकते हैं, जिससे दानों की संख्या और गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ता है.

यदि समय रहते बचाव के उपाय नहीं किए जाएं, तो किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फिर सकता है और उत्पादन में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसलिए इस चरण पर फसल की लगातार निगरानी, सही दवा का छिड़काव और उचित प्रबंधन बेहद जरूरी है. एक्सपर्ट का मानना है कि संतुलित खाद, समय पर सिंचाई और जैविक व रासायनिक दोनों प्रकार की दवाओं का उपयोग करके इन कीटों पर काबू पाया जा सकता है.
सिंचाई पर रखें ध्यान
कृषि विज्ञान केंद्र जमुनाबाद के कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप बिसेन ने बताया कि सितंबर का महीना धान की फसल के लिए बेहद अहम होता है. इस समय फसल में बाली निकलने और दानों के भरने की प्रक्रिया तेजी से चलती है. ऐसे में फसल की देखभाल और प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है. धान की फसल में इस समय हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है ताकि खेतों में नमी बनी रहे. किसानों को चाहिए कि शाम के समय हल्की सिंचाई करें और सुबह अतिरिक्त पानी निकाल दें. ऐसा करने से फसल गिरने से बचेगी और उत्पादन सुरक्षित रहेगा.
अधिक पानी से नुकसान
यदि खेतों में अधिक पानी भर जाता है तो मिट्टी नरम हो जाती है. इस वजह से हल्की हवा चलने पर भी पौधे गिर जाते हैं. पौधे के गिरने से फूल झड़ जाते हैं और दानों पर दाग लग जाते हैं, जिससे पैदावार पर नकारात्मक असर पड़ता है.
यूरिया का प्रयोग न करें
सितंबर माह में धान की फसल में यूरिया का प्रयोग नहीं करना चाहिए. अत्यधिक यूरिया डालने से फसल में भूरा फुदका रोग लग सकता है. यह कीट पौधों का रस चूसकर उन्हें सुखा देता है, जिससे उपज पर भारी असर पड़ सकता है.