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गेहूं की बुवाई से पहले 6 ग्राम ट्राइकोडर्मा से करें ये काम… कीट और बीमारियां भूल जाएंगी खेत का रास्ता

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उत्तर प्रदेश में गेहूं की बुवाई का सही समय आमतौर पर नवंबर के मध्य से दिसंबर के मध्य तक माना जाता है. राज्य के अधिकतर इलाकों में 15 नवंबर से 30 नवंबर तक की अवधि गेहूं की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त होती है. इस समय मौसम ठंडा और नमी युक्त होता है, जिससे फसल की जड़ें मजबूत बनती हैं और उत्पादन अधिक मिलता है। वहीं, जिन क्षेत्रों में धान की कटाई जल्दी हो जाती है, वहां किसान 25 अक्टूबर से 10 नवंबर के बीच जल्दी बुवाई कर सकते हैं. एक्सपर्ट के अनुसार जल्दी बुवाई से फसल को विकास के लिए पर्याप्त समय और तापमान मिलता है, जिससे पैदावार बढ़ जाती है.
किसी भी फसल की अच्छी ग्रोथ और अच्छे उत्पादन के लिए बुवाई के वक्त बीज उपचार करना जरूरी है. बीज उपचार करने से बीज जनित रोगों से निजात मिलती है. रोग कम होने की वजह से लागत में कमी आती है और फसल की उपज की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है. एक्सपर्ट के अनुसार, बीज उपचार दो तरीके से किया जा सकता है. किसान जैविक और रासायनिक तरीके से भी बीज उपचार कर सकते हैं. हालांकि, रासायनिक तरीका थोड़ा महंगा और जहरीला होता है.
बीज उपचार का प्रभावी तरीका
कृषि विज्ञान केंद्र नियामतपुर में तैनात कृषि एक्सपर्ट डॉ एनपी गुप्ता ने बताया कि इन दिनों किसान गेहूं की फसल की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं. नवंबर का यह पहला सप्ताह गेहूं की बुवाई के लिए सबसे उत्तम माना जाता है. गेहूं की बुवाई करते समय किसानों को बीज उपचार जरूर कर लेना चाहिए. बीज उपचार करने से कई तरह के फायदे होते हैं, अगर किसान जैविक तरीके से बीज उपचार करें तो यह सस्ता और प्रभावी होता है. आमतौर पर किसान रासायनिक तरीके से बीज उपचार करते हैं जो कि जहरीला और महंगा भी होता है. रासायनिक तरीके से बीज उपचार करने से कई नुकसान भी होते हैं.
जैविक तरीके से करें बीज उपचारित 
किसान रासायनिक तरीके की बजाय जैविक तरीके से भी बीज उपचारित कर सकते हैं. उसके लिए 5 से 6 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलो बीज के लिए पर्याप्त होता है. ट्राइकोडर्मा से बीज उपचारित करने से बीज जनित और भूमि जनित रोगों से फसल को बचाया जा सकता है. बीज उपचारित करके बुवाई करने से जमाव बेहतर होता है. पौधे शुरुआत से ही स्वस्थ होते हैं. किसानों को कम लागत में अच्छा उत्पादन मिलता है.