सनातन परंपरा में अमावस्या की तिथि को पूर्वजों यानी पितरों की सेवा के लिए समर्पित माना गया है। फाल्गुन मास (Falgun Maas) की अमावस्या विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शिवरात्रि के आसपास आती है और वसंत ऋतु के आगमन का संकेत देती है।
स्नान और दान का आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार, इस दिन पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा में स्नान करने से अनजाने में हुए पापों का नाश होता है। जो लोग नदी तट पर नहीं जा सकते, वे घर पर ही पानी में थोड़ा गंगाजल डालकर स्नान कर सकते हैं। स्नान के बाद तिल, गुड़, अनाज और वस्त्रों का दान करना पुण्य फल को कई गुना बढ़ा देता है।
पितृ दोष और तर्पण का विधान
पुराणों और ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष है या घर में बरकत नहीं हो रही है, तो फाल्गुन अमावस्या पर तर्पण और श्राद्ध करना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के नाम से जल अर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
तिल तर्पण: काले तिल की सहायता से पितरों को जल अर्पित करें।
पीपल पूजन: पीपल के पेड़ में कच्चा दूध और जल चढ़ाएं और सात बार परिक्रमा करें।
दीपदान: शाम के समय घर के मुख्य द्वार और दक्षिण दिशा में दीपक जलाएं।
सात्विक भोजन: इस दिन प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज करें।




