नई दिल्ली : बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन हो गया है। शेख हसीना के तख्तापलट के बाद मोहम्मद यूनुस अंतरिम प्रधानमंत्री की भूमिका निभा रहे थे, अब आम चुनाव के बाद उनके विरोधी तारिक रहमान प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। इस बार शेख हसीना की आवामी लीग को चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी गई और बीएनपी 20 सालों बाद अपनी सरकार बना रही है।
पहले शेख हसीना ढाका से सरकार चलाती थीं और तारिक रहमान लंदन में निर्वासन में थे। समय बदला और अब तारिक रहमान सरकार चलाएंगे और शेख हसीना लंदन की जगह दिल्ली से हालातों पर नजर रखेंगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अब शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग का क्या होगा?
वहीं, युनूस सरकार के दरमियान भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अभूतपूर्व तौर से बेपटरी हुए है। नई सरकार बनने के बाद भारत और बांग्लादेश की ओर रिश्ते में आए इस तनाव को खत्म करने पर जोर होगा। इसके साथ भारत को शेख हसीना के साथ अपने पुराने संबंधों से आगे बढ़कर तारिक रहमान सरकार के साथ तालमेल बिठाना होगा।
2026 के चुनाव नतीजों के शुरुआती विश्लेषण से पता चलता है कि अवामी लीग के बॉयकॉट की अपील के बावजूद, वोटों का ट्रांसफर अवामी लीग से बीएनपी को हुआ है। जो लोग वोट देना चाहते थे, उनके लिए असल में बीएनपी या बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी में से चुनना था। ज्यादातर लोगों ने तारिक रहमान की पार्टी को चुना।
इस बदलाव का एक बड़ा कारण राष्ट्रीय पहचान है। अवामी लीग और बीएनपी दोनों ही 1971 के लिबरेशन वॉर के ऐतिहासिक महत्व को मानते हैं। इसके उलट, जमात-ए-इस्लामी ने लड़ाई के दौरान पाकिस्तान का साथ दिया था, हमेशा पाकिस्तान के सपोर्ट में रहा। उस वक्त भी जब पाकिस्तान ने बांग्लादेशी लोगों पर भयानक ज़ुल्म किए थे।
जो लोग देश की सेक्युलर और राष्ट्रवादी बुनियाद को प्राथमिकता देते हैं, वे जमात को अब भी शक की नजर से देखते हैं। बीएनपी ने बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय के बीच भी काफी बढ़त हासिल की है। ये पहले से अवामी लीग की तरफ झुका हुआ था। तारिक रहमान का सबको साथ लेकर चलने वाला बराबर बांग्लादेश का वादा इन वोटर्स को पसंद आया।




