हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, होलिका दहन का पर्व केवल तिथि पर नहीं, बल्कि नक्षत्र और समय के सूक्ष्म गणित पर आधारित होता है। शास्त्रों में प्रदोष काल को होलिका दहन के लिए सबसे शुभ समय माना गया है। प्रदोष काल वह समय होता है जब दिन ढल रहा होता है और रात की शुरुआत हो रही होती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, होलिका दहन के लिए तीन बातों का मिलना बहुत जरूरी है पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो और भद्रा का साया न हो। यदि इन तीनों का उचित तालमेल न बैठे, तो पूजा के पूर्ण फल मिलने में आशंका बनी रहती है।
प्रदोष काल में जलाई गई अग्नि को अत्यंत पवित्र माना जाता है, जो घर और मन की नकारात्मकता को भस्म करने की शक्ति रखती है। यही कारण है कि पंचांग में प्रदोष काल की उपस्थिति को देखकर ही दहन का समय तय किया जाता है।
प्रदोष काल प्रारंभ: शाम 06:22 बजे से
प्रदोष काल समाप्त: रात 08:46 बजे तक
ज्योतिषीय गणित और भद्रा का त्यागहोलिका दहन में सबसे बड़ी बाधा ‘भद्रा’ होती है। शास्त्रों का नियम है कि यदि प्रदोष काल में भद्रा का साया हो तो दहन नहीं करना चाहिए। इस साल 3 मार्च 2026 को शाम के समय भद्रा का साया नहीं है, जो एक बहुत ही शुभ संभावना है।
ज्योतिषीय गणित के अनुसार, भद्रा मुख का त्याग करके प्रदोष काल में ही दहन करना शास्त्र सम्मत है। यदि प्रदोष काल में दहन न किया जाए, तो वह दोषपूर्ण माना जाता है। सही समय पर पूजा का संचालन करने से ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त होती है और जीवन में सहजता आती है।
ऐसी स्थिति में ‘शास्त्र मत’ कहता है कि जिस दिन प्रदोष काल में पूर्णिमा का आंशिक प्रभाव भी हो या तिथि का मान रहा हो, उसी दिन दहन करना चाहिए। लेकिन इस बार चंद्र ग्रहण का साया होने के कारण शाम 06:47 के बादस ही दहन करना उचित रहेगा।




