बिलासपुर : रतन बहादुर दूसरी बटालियन, छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल, सकरी में आरक्षक (कॉस्टेबल) ट्रेड के पद पर पदस्थ थे। 62 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर उन्हें सेवानिवृत्त कर दिया गया। सेवानिवृत्ति के डेढ़ महीने बाद संभागीय संयुक्त संचालक, कोष-लेखा एवं पेंशन, बिलासपुर ने उनकी सेवाकाल के दौरान गलत तरीके से वेतनवृद्धि जोड़कर अधिक वेतन भुगतान किये जाने का हवाला देते हुए रिकवरी आदेश जारी कर दिया।
संभागीय संयुक्त संचालक, कोष-लेखा एवं पेंशन द्वारा जारी रिकवरी आदेश को चुनौती देते हुए रतन बहादुर ने अधिवक्ता अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय एवं ऋषभदेव साहू के माध्यम से छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के समक्ष रिट याचिका दायर की। रिट याचिका की सुनवाई जस्टिस पीपी साहू के सिंगल बेंच में हुई। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने सिंगल बेंच के समक्ष पैरवी करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टेट ऑफ पंजाब विरूद्ध रफीक मसीह (2015), थॉमस डेनियल विरूद्ध स्टेट ऑफ केरला (2022), जोगेश्वर साहू विरूद्ध यूनियन ऑफ इंडिया (2025) एवं भगवान शुक्ला विरूद्ध यूनियन ऑफ इंडिया के मामलों में दिए गए फैसले का हवाला दिया।
पढ़िए क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों की सुनवाई के बाद अपने आदेश में कहा है, किसी भी शासकीय अधिकारी, कर्मचारी के सेवानिवृति के एक साल पहले या सेवानिवृति के बाद संबंधित शासकीय अधिकारी, कर्मचारी को पूर्व के सेवाकाल के दौरान गलत तरीके से वेतनवृद्धि तय करने और अधिक वेतन का भुगतान करने का हवाला देकर सेवानिवृति देयक से किसी भी प्रकार की वसूली नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है, इस तरह की वसूली तृतीय श्रेणी कर्मचारी से भी नहीं की जा सकती।
संभागीय संयुक्त संचालक, कोष-लेखा एवं पेंशन ने किया सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने कोर्ट को बताया,याचिकाकर्ता कांस्टेबल ट्रेड के पद पर पदस्थ थे, यह तृतीय श्रेणी का पद है। याचिकाकर्ता के रिटायरमेंट के डेढ़ महीने रिकवरी नोटिस जारी किया है, संभागीय संयुक्त संचालक, कोष-लेखा एवं पेंशन ने रिकवरी नोटिस जारी कर, सीधेतौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अवहेलना किया है। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने संभागीय संयुक्त संचालक, कोष-लेखा एवं पेंशन द्वारा जारी रिकवरी आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है, याचिकाकर्ता से वसूली की गई राशि तत्काल याचिकाकर्ता को लौटाए।



