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24 साल पुराने हत्या के प्रयास मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 2 साल की सजा घटाकर की 4 महीने

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बिलासपुर : धमतरी के सिटी कोतवाली थाना क्षेत्र में हत्या के प्रयास के 24 साल पुराने मामले में दोषी ठहराए गए दीपक कुमार ओझा को ट्रायल कोर्ट ने 2 साल के कारावास की सजा सुनाई थी. इस फैसले को चुनौती देते हुए दीपक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. करीब 24 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार उच्च न्यायालय ने उसे आंशिक राहत देते हुए सजा को घटाकर 4 महीने कर दिया. कोर्ट ने उसे 30 सितंबर 2026 तक ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर करने का निर्देश दिया है, ताकि वह अपनी शेष सजा पूरी कर सके.

सजा का मकसद एक असरदार रोकथाम बनाना : हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने प्राणघातक हमले के आरोपी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 24 वर्ष पुराना मामला होने पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायदृष्टांत का हवाला देते हुए कहा, कि सज़ा का मकसद एक असरदार रोकथाम बनाना है ताकि भविष्य में ऐसे ही क्राइम/कार्रवाइयों को रोका जा सके. सजा देते समय ध्यान में रखने वाली बात यह है कि सजा बहुत ज्याजा सख्त न हो, लेकिन साथ ही, यह इतनी हल्की भी न हो कि इसका रोकथाम वाला असर कम हो जाए. इसके साथ अपील करने वाले को चार माह कैद की सजा सुनाई. साथ ही कोर्ट ने उसके जेल में निरूद्ब समय को सजा में समायोजित करने का निर्देश दिया है.

अपीलकर्ता गुरु उर्फ राहुल उर्फ प्रवीण कुमार शिदे निवासी बांसपारा धमतरी, थाना सिटी कोतवाली धमतरी का 3 दिसंबर 2002 को दीपक कुमार ओझा के साथ झगड़ा हुआ था. झगड़े के बाद, जब दीपक ओझा अपने घर जा रहा था और वह अपने घर के सामने पहुंचा, तो आरोपी मोटरसाइकिल पर वहां पहुंचा और उसके साथ दो और लोग थे, जिन्होंने पीड़ित पर तलवार से हमला किया, जिसका मकसद उसे जान से मारना था. पीड़ित ने खुद को हमले से बचाने के लिए अपने हाथ से हमले को रोका और उसकी कोहनी में गंभीर चोट आई और फ्रैक्चर भी हो गया. घायल के रिपोर्ट पर धमतरी कोतवाली पुलिस ने धारा 307/34 के तहत अपराध पंजीबद्ब कर सीजेएम कोर्ट में चालान पेश किया. सीजेएम कोर्ट ने मामले को विचारण के लिए रायपुर जिला एवं सत्र न्यायालय भेजा. सुनवाई उपरांत ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दो वर्ष कैद एवं 500 रू अर्थदंड की सजा सुनाई.

सजा के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की थी. अपील में कहा गया कि उसने जमानत में मिली आजादी का गलत इस्तेमाल नहीं किया है. पिछले 25 वर्ष से हर सुनवाई में उपस्थित हो रहा है. इस आधार पर सजा में छूट देने अनुरोध किया गया. जस्टिस नरेन्द्र कुमार व्यास ने सुनवाई में पाया कि अपराध गंभीर था. इस कारण से आरोपी की कैद की सजा से छूट देने पेश आवेदन को खारिज किया. कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के न्यायदृष्टांत का उल्लेख करते हुए इसे रिजेक्ट किया है. लेकिन, यह देखते हुए कि घटना साल 2002 की है और करीब 24 साल बीत चुका है, और अपील करने वाले का कोई पिछला क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है क्योंकि अभियोजन ने अपील करने वाले का कोई क्रिमिनल गतिविधि रिकॉर्ड में नहीं ला पाया है, उसने ट्रायल के दौरान और अपील के पेंडिग रहने के दौरान भी उसे मिली बेल की आज़ादी का गलत इस्तेमाल नहीं किया है, इसलिए आईपीसी के सेक्शन 326 के तहत जुर्म के लिए सज़ा को घटाकर 04 महीने किया है, जिसमें से वह आईपीसी के सेक्शन 428 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के सेक्शन 468 के प्रोविज़न के अनुसार ट्रायल के दौरान जेल में रहने के कारण एक महीने और 10 दिन का सेट ऑफ़ पाने का हकदार है. इस अपील को कुछ हद तक मंज़ूरी दी जाती है. कोर्ट ने उसका बेल बॉन्ड कैंसल करते हुए अपील करने वाले को 30 सितंबर, 2026 को ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया है ताकि वह इस कोर्ट द्बारा दी गई सज़ा का बचा हुआ हिस्सा काट सके, अगर अपील करने वाला ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने में फ़ेल रहता है, तो पुलिस अधिकारियों को उसके खिलाफ एक्शन लेने और इस कोर्ट को एक कम्प्लायंस रिपोर्ट भेजने का निर्देश दिया है.