गरियाबंद : करका के जंगल में कथित अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई की जांच करने पहुंची वन विभाग की टीम को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा। वन विभाग के अनुसार, करीब 50 से 60 ग्रामीणों ने टीम को शासकीय कार्रवाई से रोकने की कोशिश की, जिसके बाद मौके पर विवाद, धक्का-मुक्की और झूमाझटकी की स्थिति बन गई।
हालांकि, घटनाक्रम में किसी वन अधिकारी या कर्मचारी के घायल होने की सूचना नहीं है। विभाग ने मामले में वीडियो साक्ष्य के आधार पर थाना खल्लारी में FIR के लिए आवेदन दिए जाने की जानकारी दी है।
जंगल के निरीक्षण के दौरान गरमाया माहौल
वन विभाग की टीम करका क्षेत्र में कथित अतिक्रमित वनभूमि के निरीक्षण और कार्रवाई के लिए पहुंची थी। विभाग के मुताबिक, टीम जब कथित अतिक्रमित क्षेत्र की ओर आगे बढ़ी तो बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए।
आरोप है कि ग्रामीणों ने शासकीय कर्मचारियों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने की कोशिश की। विभाग के अनुसार, इसी दौरान मुकेश मरकाम को मौके से ले जाया गया और पूरी घटना की वीडियोग्राफी किए जाने की बात भी सामने आई है।
वन विभाग ने उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों के आधार पर पुलिस में कार्रवाई के लिए आवेदन दिया है।
30 हजार पेड़ों की कटाई के प्रारंभिक संकेत
करका का विवाद केवल मौके पर हुए विरोध तक सीमित नहीं है। वन विभाग के अनुसार, 22 सितंबर 2026 को किए गए मैदानी निरीक्षण के दौरान 1,100 से अधिक पेड़ों पर गर्डलिंग के निशान और बड़ी संख्या में कटे हुए पेड़ों के ठूंठ मिले।
विभाग के प्रारंभिक आकलन में वर्ष 2016 से 2017 के बीच करीब 30 हजार पेड़-पौधे काटे जाने के संकेत मिले हैं।
वहीं GPS आधारित प्रारंभिक आकलन में करीब 35 हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण के संकेत मिलने की बात कही गई है। हालांकि अंतिम क्षेत्रफल का निर्धारण DGPS आधारित ड्रोन मैपिंग पूरी होने के बाद किया जाएगा।
22 हेक्टेयर से शुरू हुआ था पुराना मामला
विभागीय जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2016 में करका क्षेत्र से जुड़े 22 व्यक्तियों के खिलाफ करीब 22 हेक्टेयर घने वन क्षेत्र में कथित अतिक्रमण को लेकर POR दर्ज किया गया था।
इसके बाद वर्ष 2023 में नगरी न्यायालय ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। अब वन विभाग सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन फुटेज, GPS/DGPS मैपिंग और मैदानी साक्ष्यों के जरिए क्षेत्र की स्थिति का दोबारा आकलन कर रहा है।
करका का पुराना इतिहास भी है विवाद से जुड़ा
करका कभी एक वन ग्राम था और सोंढूर बांध के कैचमेंट क्षेत्र में तत्कालीन सीतानदी अभयारण्य के अंतर्गत आता था।
सोंढूर बांध के निर्माण के बाद वर्ष 1980 के दशक में करका गांव का विस्थापन किया गया था। उपलब्ध विभागीय अभिलेखों के अनुसार, करका के 55 व्यक्तियों को जल संसाधन विभाग की ओर से मुआवजा दिया गया था।
वन विभाग का कहना है कि इसके बावजूद बाद के वर्षों में इसी क्षेत्र की ऊंचाई पर स्थित वनभूमि में दोबारा अतिक्रमण और वन कटाई की गतिविधियों के संकेत सामने आए।
वन्यजीवों के लिए भी महत्वपूर्ण क्षेत्र
वन विभाग के अनुसार, करका का जंगल वन्यजीवों और हाथियों के आवागमन के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जंगल के क्षरण से वन्यजीवों के आवागमन मार्ग प्रभावित होने और भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका जताई गई है।
विभाग का दावा है कि पिछले चार वर्षों में करीब 1,050 हेक्टेयर अतिक्रमित वनभूमि मुक्त कराई गई है। अब करका में हुई कार्रवाई और ग्रामीणों के विरोध के बाद पुराना अतिक्रमण विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
अब जांच के सामने कई सवाल
करका में मौजूदा विवाद के बीच सबसे अहम सवाल वनभूमि के वास्तविक क्षेत्रफल, पेड़ों की कटाई की अवधि और कथित अतिक्रमण की स्थिति को लेकर है। इनका अंतिम निर्धारण ड्रोन मैपिंग और अन्य साक्ष्यों के आधार पर किया जाना है।
वहीं, वर्षों पुराने विस्थापन और मुआवजे के रिकॉर्ड के बीच वनभूमि पर दोबारा अतिक्रमण के आरोपों ने पूरे मामले को और पेचीदा बना दिया है। फिलहाल वन विभाग के दावों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ रही है।



