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क्या राजनीति की पकड़ में फंसे लोकतंत्र के तीन स्तंभ? न्याय में देरी, व्यवस्था पर सवाल… क्या निष्पक्षता हो रही है खत्म?

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परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद/ छुरा  : देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मज़बूत बनाने वाले चार प्रमुख स्तंभ – न्यायपालिका, कार्यपालिका, मीडिया और विधायिका – आज सवालों के घेरे में हैं। आम जनता को न्याय मिलने में हो रही देरी, सरकारी व्यवस्था की निष्क्रियता और मीडिया की निष्पक्षता पर उठते सवालों ने यह चिंता गहरी कर दी है कि क्या इन संस्थानों पर राजनीति का प्रभाव हावी होता जा रहा है?न्यायपालिका में लंबित मामलों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। एक आम नागरिक को वर्षों तक फैसले का इंतजार करना पड़ता है, जिससे न्याय मिलने की उम्मीद भी धुंधली होती जा रही है। वहीं कार्यपालिका, जो आमजन के हितों की रक्षा की जिम्मेदार मानी जाती है, आज राजनीतिक दबावों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है।

मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, अब अपनी भूमिका को लेकर कटघरे में खड़ा है। यह आरोप लगते रहे हैं कि मुख्यधारा की मीडिया आज सत्तारूढ़ दलों के प्रचारक की भूमिका निभा रही है, बजाय जनहित के मुद्दों को उजागर करने के।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब लोकतंत्र के ये प्रमुख स्तंभ ही राजनीति की पकड़ में आने लगें, तो देश के संविधान और जनतंत्र की आत्मा पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है। ज़रूरत इस बात की है कि इन संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को पुनः स्थापित किया जाए, ताकि आमजन का भरोसा कायम रह सके।

ताजा उदाहरण लोकतंत्र के चौथे स्तंभ समझे जाने वाले पत्रकारों का ही है जहां बिलासपुर के पत्रकार सुशील पाठक की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और आज तक किसी अपराधी को इस हत्याकांड में सजा नहीं हो पाया और सीबीआई जैसे जांच एजेंसी ने इसमें क्लोजर लगा दिया। दुसरी घटना गरियाबंद जिले के छुरा नगर के पत्रकार उमेश राजपूत का है जिसे 23 जनवरी 2011 को उनके ही निवास पर रिहाइशी इलाके में थाने से कुछ ही फलांग की दुरी पर घर पर पांच लोगों की उपस्थिति में दिन दहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिसके बाद चार वर्षों तक स्थानीय पुलिस ने जांच की लेकिन अपराधियों के नहीं पकड़े जाने पर परिजनों की मांग पर उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच का आदेश देते हुए कहा था कि इस हत्याकांड की जांच सीबीआई जल्द पुरा कर सील बंद लिफाफे में जांच रिपोर्ट उच्च न्यायालय में पेश करे। वहीं सीबीआई के जांच के दौरान स्थानीय पुलिस थाने से साक्ष्य गायब मिले जिसमें घटना स्थल पर मिले धमकी भरा पत्र, फायरिंग हुए कपड़े के पर्दे, गन के छर्रे, मोबाइल फोन, कम्प्यूटर जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब मिले थे लेकिन आज दस वर्षों बाद भी जांच रिपोर्ट उच्च न्यायालय में पेश नहीं हो पाया है और मामला सीबीआई न्यायालय में लंबित है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ समझे जाने वाले पत्रकारों के मामले में ये हाल है तो आम जनता न्याय मिलने पर कितना विश्वास करे ये बड़ा सवाल है।

लोकतंत्र के ये स्तंभ जब डगमगाने लगें, तो आवाज़ उठाना जरूरी हो जाता है — ताकि व्यवस्था फिर जनता की सेवा में खड़ी हो सके, न कि राजनीति की कठपुतली बनकर रहे।