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नवजात को पहली बार मंदिर ले जाने का क्या है नियम? सूर्य दर्शन से लेकर देव दर्शन तक जानें पूरी विधि

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नवजात को पहली बार मंदिर ले जाना: बच्चे के जन्म के बाद हर माता-पिता के मन में यह सवाल जरूर आता है कि नवजात को पहली बार घर से बाहर कब ले जाना चाहिए और मंदिर में भगवान के दर्शन कब कराए जाने चाहिए। हिंदू धार्मिक परंपराओं में नवजात के पहली बार घर से बाहर निकलने को एक विशेष संस्कार से जोड़ा गया है, जिसे निष्क्रमण संस्कार कहा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्म के बाद शिशु को तुरंत मंदिर ले जाने के बजाय जन्माशौच की अवधि पूरी होने और शुद्धि संस्कार के बाद बाहर ले जाने की परंपरा है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसके समय को लेकर कुछ अंतर देखने को मिलता है।

11वें या 12वें दिन मंदिर ले जाने की मान्यता

प्रचलित धार्मिक परंपरा के अनुसार, बच्चे के जन्म के 11वें या 12वें दिन नामकरण संस्कार और शुद्धि पूजा के बाद उसे पहली बार मंदिर ले जाने की परंपरा बताई जाती है।

इस दौरान परिवार बच्चे को भगवान के दर्शन कराता है और उसके स्वस्थ, सुखी एवं मंगलमय जीवन की कामना करता है।

हालांकि कुछ परिवारों और क्षेत्रीय परंपराओं में नवजात को लगभग 40 दिन बाद पहली बार घर से बाहर ले जाने की मान्यता भी है। इसलिए पहली मंदिर यात्रा का समय परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक रीति के अनुसार अलग हो सकता है।

क्या है निष्क्रमण संस्कार?

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर जीवन के अलग-अलग चरणों से जुड़े 16 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। इन्हीं में निष्क्रमण संस्कार को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

‘निष्क्रमण’ का सामान्य अर्थ बाहर निकलना है। इस संस्कार के माध्यम से शिशु को पहली बार घर की सीमा से बाहर ले जाकर सूर्य दर्शन और देव दर्शन कराने की परंपरा बताई जाती है। आम तौर पर इसे नामकरण संस्कार के बाद किए जाने वाले संस्कार के रूप में माना जाता है।

बच्चे को मंदिर ले जाते समय क्या किया जाता है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, बच्चे को मंदिर ले जाकर भगवान के सामने उसके स्वस्थ और सुखी जीवन की प्रार्थना की जाती है। पूजा के दौरान बच्चे के लिए शांति, निर्भयता, अच्छे संस्कार और दीर्घायु की कामना की जाती है।

परिवार के लोग प्रार्थना करते हैं कि बच्चा आगे चलकर शांत स्वभाव वाला, संयमी, निर्भय और सभी के प्रति प्रेम रखने वाला बने।

सूर्य दर्शन का भी है महत्व

निष्क्रमण संस्कार में सूर्य दर्शन को भी महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक परंपरा में सूर्य को जीवन, ऊर्जा और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है। इसलिए बच्चे को पहली बार घर से बाहर निकालने के दौरान सूर्य देव के दर्शन कराने की परंपरा कई परिवारों में प्रचलित है।

40 दिन बाद बाहर ले जाने की परंपरा क्यों?

कुछ क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं में प्रसव के बाद लगभग 40 दिनों तक मां और बच्चे को विशेष देखभाल में रखने की परंपरा रही है। इस अवधि के बाद शिशु को पहली बार मंदिर या अन्य धार्मिक स्थान पर ले जाने की मान्यता मिलती है।

इसलिए यदि किसी परिवार में 40 दिन बाद बच्चे को मंदिर ले जाने की परंपरा है, तो उसे उसी पारिवारिक रीति के अनुसार निष्क्रमण संस्कार कराया जा सकता है।

नवजात को मंदिर ले जाते समय रखें इन बातों का ध्यान

धार्मिक परंपरा के साथ-साथ नवजात की सुविधा और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। पहली बार मंदिर ले जाते समय बहुत अधिक भीड़, तेज आवाज और लंबे समय तक बाहर रहने से बचना बेहतर है। बच्चे को मौसम के अनुसार कपड़े पहनाएं और मंदिर में धूप, धुएं या तेज सुगंध के सीधे संपर्क से बचाएं।